Sunday, January 19, 2014

आत्मोपदेश




शांत हो स्वस्थ हो, अंतरी न भ्रष्ट हो

दक्ष हो सुस्पष्ट हो, अंतरी न कष्ट हो 

मुक्त हो स्वतंत्र हो, अंतरी निर्बंध हो ........

सप्रेम  हो क्षेम हो, अंतरी न दुष्ट हो 

देय हो गेय हो, अंतरी निश्रेय हो ...........

शस्त्र हो धर्म हो, अंतरी न गर्व हो 

मंत्र हो तंत्र हो, अंतरी न वर्म हो 

दिप्त हो तृप्त हो, अंतरी उदात्त हो ............

सिद्ध हो स्वरूप हो, अंतरी न त्रस्त हो 

सत्य हो तीर्थ हो, अंतरी न ग्रस्त हो 

भक्त हो अनंत हो, अंतरी कृतार्थ हो ............

गंध हो स्पंद हो, अंतरी न धुंद हो 

सुप्त हो गुप्त हो, अंतरी न मंद हो 

ध्येय हो श्रेय हो, अंतरी उन्मुक्त हो .........

रचना: हेमंत केतकर 


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