शांत हो स्वस्थ हो, अंतरी
न भ्रष्ट हो
दक्ष हो सुस्पष्ट हो, अंतरी
न कष्ट हो
मुक्त हो स्वतंत्र हो, अंतरी
निर्बंध हो ........
सप्रेम हो क्षेम हो, अंतरी न दुष्ट हो
देय हो गेय हो, अंतरी निश्रेय
हो ...........
शस्त्र हो धर्म हो, अंतरी
न गर्व हो
मंत्र हो तंत्र हो, अंतरी
न वर्म हो
दिप्त हो तृप्त हो, अंतरी
उदात्त हो ............
सिद्ध हो स्वरूप हो, अंतरी
न त्रस्त हो
सत्य हो तीर्थ हो, अंतरी
न ग्रस्त हो
भक्त हो अनंत हो, अंतरी कृतार्थ
हो ............
गंध हो स्पंद हो, अंतरी न
धुंद हो
सुप्त हो गुप्त हो, अंतरी
न मंद हो
ध्येय हो श्रेय हो, अंतरी
उन्मुक्त हो .........
रचना: हेमंत केतकर
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